नागपुर न्यूज डेस्क: मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि पत्नी नौकरी करती है और घर के कामकाज में योगदान नहीं देती, तो उससे घर खर्च में आर्थिक सहयोग की अपेक्षा करना भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत क्रूरता या अवैध धन की मांग नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने पति, सास और ससुर के खिलाफ दर्ज मामला रद्द कर दिया।
मामला नागपुर के मानकापुर क्षेत्र के एक दंपति से जुड़ा है, जिनका प्रेम विवाह हुआ था और उनका एक बेटा भी है। पत्नी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष ने उसके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की। उसने यह भी दावा किया कि उस पर पूरा वेतन घर में जमा कराने का दबाव बनाया गया और 2.32 लाख रुपये देवर के खाते में ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। साथ ही प्रसव का खर्च खुद उठाने और प्रसव के बाद मायके भेज दिए जाने का भी आरोप लगाया गया।
सुनवाई के दौरान पति पक्ष ने अदालत में बैंक रिकॉर्ड पेश किए, जिनसे पता चला कि संबंधित रकम कोविड काल में पति के इलाज पर खर्च की गई थी। पति का इलाज एक निजी अस्पताल में हुआ था और बाद में उस खर्च की प्रतिपूर्ति भी पत्नी को मिल गई थी। अदालत ने माना कि आर्थिक लेनदेन को प्रताड़ना का रूप देकर पेश किया गया, जबकि उपलब्ध दस्तावेजों से ऐसा कोई उद्देश्य साबित नहीं होता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नौकरीपेशा पत्नी से घर खर्च में योगदान देने की अपेक्षा करना अपने आप में न तो अवैध मांग है और न ही क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने यह भी नोट किया कि पति द्वारा बच्चे की कस्टडी के लिए याचिका दायर किए जाने के बाद विवाद बढ़ा और शिकायत दर्ज कराई गई। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने पति, सास और ससुर के खिलाफ दर्ज मामला रद्द कर दिया, हालांकि उन्हें जनकल्याण कोष में 10 हजार रुपये जमा कराने का निर्देश दिया गया।