नागपुर न्यूज डेस्क: नागपुर में पारा 43 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचने के साथ ही स्कूलों की कक्षाएं तपते हुए 'हीट ट्रैप' में बदल गई हैं। विदर्भ की इस भीषण गर्मी के बावजूद स्कूलों के समय में बदलाव न होना महाराष्ट्र सरकार की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग दोपहर के समय घरों में रहने की सलाह दे रहा है, वहीं शिक्षा विभाग की चुप्पी ने अभिभावकों और बच्चों को दोहरे संकट में डाल दिया है।
प्रशासनिक उदासीनता और स्थानीय आक्रोश:
विदर्भ राज्य आंदोलन समिति के प्रमुख वामनराव चटप ने नीति निर्माताओं पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे सरासर लापरवाही करार दिया है। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री स्वयं नागपुर से हैं, तब भी विदर्भ की गर्मियों की गंभीरता को नजरअंदाज करना दुर्भाग्यपूर्ण है। स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों का मानना है कि नीति बनाने वाले नौकरशाह विदर्भ की जमीनी हकीकत से कटे हुए हैं। लोगों में इतना गुस्सा है कि कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया कि अधिकारियों को दोपहर के समय इन कक्षाओं में बिठाया जाना चाहिए ताकि उन्हें बच्चों की तकलीफ का अहसास हो।
क्षेत्रीय असमानता और अलग कैलेंडर की मांग:
शिक्षा कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने तर्क दिया है कि पूरे महाराष्ट्र के लिए एक जैसा शैक्षणिक कैलेंडर (Uniform Academic Calendar) तर्कहीन है। विदर्भ की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां मुंबई या पुणे से बिल्कुल अलग हैं। शिक्षा विशेषज्ञ योगेश पठारे के अनुसार, नीति निर्माण में क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन को जगह मिलनी चाहिए। कई नागरिकों का यह भी मानना है कि यदि विदर्भ एक अलग राज्य होता, तो यहां की भौगोलिक जरूरतों के हिसाब से मार्च में ही सत्र समाप्त करने जैसे निर्णय स्थानीय स्तर पर लिए जा सकते थे।
जोखिम में बच्चों का स्वास्थ्य:
राज्य सरकार की ओर से किसी स्पष्ट नीति के अभाव में जिला प्रशासन केवल खानापूर्ति कर रहा है। स्कूलों की टाइमिंग कम न होने के कारण बच्चे दिन के सबसे गर्म घंटों में यात्रा करने और कक्षाओं में बैठने को मजबूर हैं, जिससे हीटस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ गया है। जनता अब केवल कागजी सलाह नहीं, बल्कि धरातल पर ठोस कार्रवाई की मांग कर रही है ताकि मासूम बच्चों को इस जानलेवा तपिश से बचाया जा सके।