नागपुर न्यूज डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने शिक्षक बर्खास्तगी से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच का बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार किए बिना सिर्फ एक मुद्दे के आधार पर फैसला देकर “मूलभूत त्रुटि” की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालयों को विवाद के सभी बिंदुओं पर कारण सहित निर्णय देना आवश्यक होता है।
यह मामला नागपुर की एक शिक्षिका की बर्खास्तगी से जुड़ा है, जिन्हें मई 2017 में स्कूल ट्रिब्यूनल नागपुर, वडधामना द्वारा कथित अनुशासनहीनता के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था। इसके बाद अगस्त 2019 में स्कूल ट्रिब्यूनल नागपुर ने बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए शिक्षिका को सेवा में बहाल करने और अन्य लाभ देने का निर्देश दिया था।
सितंबर 2024 में हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने संस्थान की याचिका स्वीकार करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि ट्रिब्यूनल ने कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों, विशेष रूप से उस प्रस्ताव को नहीं देखा जिसमें संस्थान के सचिव को अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार दिया गया था।
इसके बाद शिक्षिका ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करते हुए कहा कि विभागीय जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हुई थी। उनका आरोप था कि उन्हें प्रबंधन के मुख्य गवाह और अन्य गवाहों से पूरी तरह जिरह करने का मौका नहीं दिया गया। हालांकि हाईकोर्ट ने सितंबर 2024 में उनकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी।
अब दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को मामले के सभी मुद्दों—जैसे प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन और ट्रिब्यूनल के फैसले की वैधता—पर भी विचार करना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षिका अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी हैं, इसलिए सेवा में बहाली की संभावना कम है। अब हाईकोर्ट को यह तय करना होगा कि क्या ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करने में सही कदम उठाया था और क्या शिक्षिका बैक वेज तथा सेवानिवृत्ति लाभ पाने की हकदार हैं।
साथ ही शीर्ष अदालत ने देवेंद्र कुमार उपाध्याय, बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं, से अनुरोध किया है कि मामले को किसी उपयुक्त पीठ को सौंपकर चार महीने के भीतर निपटाने का प्रयास किया जाए। अदालत ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के जरिए समझौते की संभावना भी खुली रखने की बात कही है।