नागपुर न्यूज डेस्क: सेवा में रहते हुए पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाले प्रोफेसरों को अतिरिक्त वेतन वृद्धि देने से इनकार करने वाले महाराष्ट्र सरकार के आदेश को मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने रद्द कर दिया है। इस फैसले से पात्र प्रोफेसरों को आर्थिक लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है। विश्वविद्यालय शिक्षण मंच (एबीआरएसएम) ने इसे अपने प्रयासों की जीत बताया है।
क्या था पूरा मामला?
इस मामले में 28 प्रोफेसरों ने महाराष्ट्र सरकार के उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग समेत संबंधित अधिकारियों के खिलाफ रिट याचिका (क्रमांक 5302/2026) दायर की थी। इन सभी प्रोफेसरों ने नौकरी में रहते हुए पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। उनका दावा था कि सरकार के संबंधित आदेशों के तहत वे अतिरिक्त वेतन वृद्धि पाने के पात्र हैं। हालांकि, नागपुर विभाग के उच्च शिक्षा सहसंचालक ने 23 मार्च 2026 को आदेश जारी कर उन्हें वेतन वृद्धि देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद प्रोफेसरों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
प्रोफेसरों ने कोर्ट में क्या दलील दी?
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट ए. आई. शेख ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि संबंधित प्रोफेसरों ने छठे वेतन आयोग के कार्यकाल के दौरान और 8 मार्च 2019 से पहले पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। महाराष्ट्र सरकार के 12 अगस्त 2009 और 22 सितंबर 2011 के शासनादेशों में दी गई शर्तों के मुताबिक, वे अतिरिक्त वेतन वृद्धि पाने के हकदार हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट के 10 दिसंबर 2024 के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया गया। उस समय रिट याचिका क्रमांक 67/2023 में अदालत ने इसी तरह के मामले में प्रोफेसरों के पक्ष में फैसला सुनाया था।
पात्र प्रोफेसरों को मिलेगा आर्थिक लाभ?
विश्वविद्यालय शिक्षण मंच के मुताबिक, इससे पहले औरंगाबाद पीठ में भी इसी तरह के मामलों में प्रोफेसरों को राहत दिलाने में मंच को सफलता मिली थी। अब नागपुर पीठ ने भी सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें वेतन वृद्धि देने से इनकार किया गया था।
इस फैसले का स्वागत करते हुए विश्वविद्यालय शिक्षण मंच के महामंत्री डॉ. सतीश चाफले ने कहा कि इससे पात्र प्रोफेसरों को उनका हक का आर्थिक लाभ मिलने का रास्ता साफ हुआ है। उन्होंने इसे प्रोफेसरों की कानूनी लड़ाई की जीत बताया।