नागपुर न्यूज डेस्क: नागपुर संतरे, जीरो माइल, दीक्षाभूमि और टाइगर सफारी के लिए जाना जाता है, लेकिन शहर की पहचान से जुड़ा एक अनोखा उत्सव भी है—मारबत और बडग्या। अगस्त-सितंबर के दौरान मनाए जाने वाले इस उत्सव में काले और पीले रंग की बड़ी-बड़ी पुतलेनुमा आकृतियां तैयार की जाती हैं और उनका जुलूस निकाला जाता है। यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि बुराइयों, बीमारी, अंधविश्वास और समाज में फैली गलत परंपराओं को खत्म करने का प्रतीक भी मानी जाती है।
मारबत उत्सव की शुरुआत तान्हा पोला के मौके से जुड़ी है। इसमें काली मारबत और पीली मारबत के साथ छोटे-छोटे बडग्या भी जुलूस का हिस्सा बनते हैं। बांस, कपड़े, भूसे और कागज से तैयार किए जाने वाले इन पुतलों की परंपरा करीब डेढ़ सदी पुरानी है। काली मारबत को बुरी शक्तियों का प्रतीक माना जाता है, जबकि पीली मारबत को देवी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि जुलूस के बाद इन पुतलों का दहन बुराइयों के अंत और अच्छी सोच व सकारात्मक बदलाव के स्वागत का संदेश देता है।
काली मारबत को लेकर पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ इसका इतिहास भी खास है। काली मारबत आयोजन समिति के अध्यक्ष गौरव हारडे के मुताबिक, इसका संबंध भगवान कृष्ण को मारने आई राक्षसी पूतना की कथा से जोड़ा जाता है। उनके अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौर में भोंसले राजघराने की बकाबाई के अंग्रेजों से हाथ मिलाने के विरोध में भी काली मारबत के जुलूस को प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर देखा गया। वहीं पीली मारबत की परंपरा को लोकमान्य तिलक के गणेश उत्सव की तरह लोगों को एकजुट करने और अंग्रेजी शासन के खिलाफ सामाजिक संदेश फैलाने से भी जोड़ा जाता है।
पीली मारबत आयोजन समिति के कोषाध्यक्ष देविदास गंगाधरराव गभाने के मुताबिक, इस परंपरा का संबंध महाभारत और पूतना की कथा से भी माना जाता है। जुलूस के दौरान महिलाएं बच्चों को साथ लेकर मारबत का आशीर्वाद लेने पहुंचती हैं, जिससे यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। बताया जाता है कि काली मारबत की शुरुआत करीब 1881 में टेली समुदाय के लोगों ने की थी, जबकि पीली मारबत की परंपरा 1885 में शुरू हुई। उस समय अंग्रेजों के शासन में बड़े समूहों के जुटने पर पाबंदियां थीं, लेकिन त्योहारों के बहाने लोग एक साथ आ सकते थे। इसी वजह से मारबत उत्सव को सामाजिक जागरूकता और लोगों को एकजुट करने के माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया। आज भी यह उत्सव नागपुर की सांस्कृतिक पहचान और बुराइयों के खिलाफ सामूहिक आवाज का प्रतीक बना हुआ है।