नागपुर न्यूज डेस्क: नागपुर के आदित्य मंगल की कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादे बुलंद हों, तो शारीरिक सीमाएं कभी भी सफलता के मार्ग में बाधा नहीं बन सकतीं। आदित्य ने अपनी दृष्टिबाधिता को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। 12वीं की परीक्षा में 84 प्रतिशत अंक हासिल करके उसने यह साबित कर दिया है कि हौसले के सामने नियति भी झुक जाती है। उसकी यह उपलब्धि उन सभी के लिए एक उदाहरण है जो विपरीत परिस्थितियों में हार मान लेते हैं।
एक किसान परिवार में जन्मे आदित्य के लिए यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कॉलेज के छात्र आदित्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत सामान्य थी। समाज कल्याण छात्रावास में रहकर, वह रोज सिटी बस से कॉलेज जाता था। गरीबी और शारीरिक लाचारी के बावजूद, उसने अपने शिक्षा के प्रति समर्पण को टूटने नहीं दिया। उसकी मेहनत और कॉलेज तक का यह रोज का सफर, साहस और दृढ़ संकल्प की एक जीती-जागती मिसाल है।
आदित्य अपनी इस सफलता का श्रेय अपने परिवार, शिक्षकों और मित्रों को देता है, जिन्होंने हर कदम पर उसका समर्थन किया। वह आत्मविश्वास के साथ कहता है, "मेरी आंखों में रोशनी भले ही न हो, लेकिन मेरा लक्ष्य मेरे मन की आंखों के सामने पूरी तरह स्पष्ट है।" सकारात्मकता और इसी स्पष्ट दृष्टि के कारण वह हर बाधा को पार करने में सफल रहा। उसने साबित कर दिया है कि यदि मन में दृढ़ विश्वास हो, तो कोई भी लक्ष्य हासिल करना असंभव नहीं है।
आदित्य का सपना यहीं रुकने वाला नहीं है, उसका ध्येय अब और बड़ा हो गया है। वह भविष्य में एमपीएससी (MPSC) परीक्षा पास करके एक प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहता है। उसे अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के जरूरतमंदों और पिछड़ों के लिए काम करना है। आदित्य की यह प्रेरणादायक यात्रा उन युवाओं के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जो छोटी-छोटी समस्याओं से परेशान हो जाते हैं। उसकी कहानी हमें सिखाती है कि वास्तविक बाधाएं केवल मन में होती हैं।